देहलीज पर खड़ी वो निगाहें ना अंदर जाना चाहती है ना बहार.... झुकती हैं कभी उठती है..... ढूंढती है वो मेहफ़ूज़ अपनों को... चारो तरफ को..... कौन सुनेगा उन चीखती निगाहों का शोर जो बहुत शांत दिखती है... अपनों से ही खौफ जड़ा है वो बहार कहाँ आशियाना ढूंढ लेगी.... जब अपनों ने ना छोड़ा तो बहार किसी पर भरोषा कैसे कर लेगी.... लोग कहते हैं तम्हारे कपडे छोटे हैं... जनाब आपकी सोच छोटी हैं... उस चार महीने की बच्ची से पूछिए वह बुरखा कहाँ से ले... दोष उसका हैं की वो लड़की हैं या फिर उन् निगहाओं के जो उसे हर वक़्त नोच कर खाती हैं... देहलीज पर खड़ी वो निगाहें ना अंदर जाना चाहती है ना बहार जाना चाहती हैं... हर शख्स से यही पूछती हैं वह मेरा गुनाह हैं क्या.... मेरा गुनाह हैं क्या.....मेरा गुनाह हैं क्या...
#true love is the only thing that gives the life real meaning
ReplyDeleteVery nice ��
ReplyDeleteYes it's true..very nice
ReplyDeleteTum ho....
ReplyDeleteNice one again
Suprb 👌
ReplyDeleteThank you 😊
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